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बताशा के लिए तोड़ रहे मंदिर!

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विष्णुकांत मिश्र
19 अप्रैल 2024
Patna : शिकारी आयेगा, जाल बिछायेगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं. तोते के इस पाठ को अनवरत रटते रहने के बाद भी तोतों का झुंड लोभ का संवरण नहीं कर सका और जाल में फंस गया. लोभ के दुष्परिणाम से बचने की सीख देने वाली यह कहानी खूब सुनायी और सुनी जाती है. तब भी गांव- समाज में लोभियों की संख्या कम नहीं हुई है. लोग चकित होंगे कि लोकसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच लोभी, शिकारी, जाल और दाना की चर्चा का तुक क्या है? तुक है. यह कि इस चुनाव में सियासी शिकारी ने बड़ी चतुराई से जाल बिछा दिया है. दो- चार सीटों पर उम्मीदवार के तौर पर दाना डाल दिया है और दुष्परिणामों से बेफिक्र कुछ सामाजिक समूह उस जाल में स्वेच्छया फंसने को उतावले हो गयेे हैं. दूसरे शब्दों में कहें, तो अपने ही समाज के हित- अहित को ध्यान में न रख बताशा के लिए मंदिर तोड़ने पर आमादा हो गये हैं.

तरस आ रहा बुद्धि पर
परन्तु, इन सामाजिक समूहों के चेतना संपन्न तबके को यह उतावलापन रास नहीं आ रहा है. अंतर्मन को साल रहा है. उतावले लोगों की इस बुद्धि पर तरस भी आ रहा है. लोकतांत्रिक व्यवस्था (democratic system) में मनमाफिक निर्णय करने का अधिकार सबको है. इसलिए इस पर खुली बहस की गुंजाइश नहीं बनती है. पर, खुद के सामाज (society) के प्रति दायित्व भी मायने रखता है. संबद्ध समाज के अंदर इसी दायित्व पर मंथन हो रहा है. विशेष कर उन दो समाजों के अंदर जिनमें एक सत्ता पर काबिज है तो दूसरा खुद को सत्ता हासिल करने के करीब मानता है. जानकारों के मुताबिक इस बात पर चिंतन- मनन जबरदस्त तरीके से हो रहा है कि उम्मीदवारी के रूप में दाना डाल इन दोनो सामाजिक समूहों को सत्ता से इतना दूर कर देने का षड्यंत्र रच दिया गया है कि फिर कभी इस ओर ये फटक नहीं पायेंगे!

गुंजाइश तनिक भी नहीं
विश्लेषकों की समझ में यह चिंता बेसिरपैर की नहीं है. अप्रत्यक्ष रूप से नीतीश कुमार (Nitish Kumar) भी इस बाबत आगाह कर रहे हैं. राजनीतिक फरेबियों के फेर में नहीं फंसने की सलाह दे रहे हैं. पर, उसका कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है. बहरहाल, राजनीति (Politics) संभावनाओं का खेल है. इसमें कब क्या हो जायेगा, कोई दावे के साथ नहीं कह सकता. पर, सियासी शिकारी ने जो षड्यंत्र रच दिया है उसमें उक्त दो सामाजिक समूहों के लिए भविष्य में सत्ता पाने की गुंजाइश तनिक भी नहीं दिखती है. कुछ लोग कह सकते हैं कि दो – चार सीटों से क्या फर्क पड़ जायेगा? ऐसा कहना स्वाभाविक है. राजनीति पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा, पर उक्त दोनों सामाजिक समूहों का हित गहरे रूप से अवश्य प्रभावित हो जायेगा. और की बात छोड़ दें, ऐसी चिंता इन सामाजिक समूहों के प्रबुद्ध वर्ग को भी है.


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एनडीए पिछड़ गया तब …
फर्क नहीं पड़ने की बात करने वालों की समझ में शायद यह तथ्य नहीं है कि एनडीए के उम्मीदवारों के पिछड़ जाने की स्थिति में लोकसभा की यही दो – चार सीटें बिहार (Bihar) में उस समाज की सत्ता समेट दे सकती हैं जो अठारह साल से उस पर काबिज है. इसके साथ ही उस दूसरे समाज की सत्ता की संभावनाओं को समाप्त कर दे सकती हैं जो लम्बे जद्दोजहद के बाद खुद को उसके करीब महसूस कर रहा है. इसको इस रूप में आसानी से समझा जा सकता है. बिहार की रजनीति में नीतीश कुमार का महत्व मुख्यतः इन्हीं सामाजिक समूहों में मज़बूत पैठ को लेकर है. उनका जनाधार भी यही माना जाता है. ऐसे सामाजिक समूहों की अच्छी मत संख्या वाले क्षेत्रों में एनडीए पिछड़ जाता है, तो उसे नीतीश कुमार के जनाधार में क्षरण के रूप में देखा जायेगा. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब इस रूप में जनाधार ही खिसक जायेगा तो राजनीति में महत्व मिलना बंद नहीं हो जायेगा? फिर सत्ता बची रह पायेगी?

संभावना बनी रह पायेगी?
विश्लेषकों का मानना है कि प्रदेश भाजपा (State BJP) में सम्राट चौधरी (Samrat Chaudhary) की बढ़ी हैसियत से देर – सबेर राज्य की सत्ता (state power) उनके समाज के हाथ में आने की संभावना जागृत है. सवाल यहां यह है कि उनके समाज के मतों की बहुतायत वाले क्षेत्रों में एनडीए (NDA) के पिछड़ जाने के बाद ऐसी संभावना बची रह जायेगी ? समाप्त नहीं हो जायेगी? यही सवाल उक्त सामाजिक समूहों के विचारवान तबके के दिमाग को मथ रहा है. हालांकि, यह कहना और मानना जल्दबाजी होगी कि कुछ क्षेत्रों के प्रतिकूल परिणाम से ही ऐसा कुछ हो जायेगा. तब भी नीतीश कुमार की उम्र और ढलान पर सरक रही उनकी राजनीति को देखते हुए इसे सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता.

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