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राजनीति: शकील तो सिमट गये, तारिक का क्या होगा ?

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संजय वर्मा

16 मई 2023

PATNA : कांग्रेस की राजनीति में डा. शकील अहमद(Dr. Shakeel Ahmed) की पहचान शिष्ट, शालीन और समर्पित खानदानी नेता की रही है. इस खासियत को सम्मानजनक हैसियत भी मिलती रही है. वर्तमान में करीब – करीब उपेक्षित हैं. यह कहें कि उक्त हैसियत को उन्होंने खुद मिटा ली , तो वह कोई आपत्तिजनक (Offensive) बात नहीं होगी . खुद की लोकप्रियता के भ्रम में 2019 के संसदीय चुनाव के वक्त कांग्रेस (Congress) के प्रति उनकी निष्ठा डगमगा गयी . बगैर गंभीरता से विचार किये गठबंधन की विवशता भरे नेतृत्व के निर्णय की‌ अवहेलना कर मधुबनी (Madhubani) में निर्दलीय मैदान में कूद गये. आशंका के अनुरूप हश्र हुआ. बाद के बदले हालात में अन्य कुछ नेताओं की तरह पार्टी में वापसी तो हो गयी, पर अब तक के राजनीतिक जीवन की इस एकलौती चूक से साख और विश्वास, दोनों संदिग्ध(Suspicious) हो गये. फलस्वरूप फिर से कांग्रेस की मुख्यधारा से जुड़ नही पाये , हाशिए की शोभा बढ़ाते रहे. अब भी बढ़ा ही रहे हैं.

कोई पुरसाहाल नहीं
डा. शकील अहमद के इस हालात में पहुंचने में अपनी तो गलती थी ही, पूर्व सांसद तारिक अनवर (Tariq Anwar) के लम्बे अरसे बाद हुए पुनर्जुड़ाव ने भी कांग्रेस में उनकी मौजूदगी को महत्वहीन बना दिया. विश्लेषकों की मानें तो सिर्फ डा. शकील अहमद ही नहीं, कांग्रेस की ‘अर्द्ध हिन्दुत्व (Semi-Hinduism) ‘ आधारित परिवर्तित राजनीति में किसी भी मुस्लिम नेता की कहीं वैसी पूछ नहीं है जैसी पहले होती थी. विशेष कर सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) के अति विश्वसनीय रहे कद्दावर नेता अहमद पटेल(Ahmad Patel) के इंतकाल और गुलाम नबी आजाद (Gulam Nabi Azad)के कांग्रेस से अलगाव के बाद से कथित रूप से इनका कोई पुरसाहाल नहीं है. बड़े चेहरे में ले दे कर एक तारिक अनवर हैं, पर वर्तमान में उनकी हैसियत ‘ शो केस ‘ सरीखी ही है, ऐसा राजनीति महसूस करती है.

सोनिया गाँधी और डॉ. शकील अहमद.

नहीं था और कोई विकल्प
बात अब डा. शकील अहमद की. बिहार और केंद्र में मंत्री रहे डा. शकील अहमद मधुबनी संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ते थे. कभी जीत तो कभी हार होती थी . राजद (RJD) से चुनावी तालमेल में भी यह सीट उनके लिए कांग्रेस के हिस्से में रहती थी. 2019 में महागठबंधन (Mahagathbandhan) में वीआईपी (VIP) के हिस्से में चली गयी. वह खुद को रोक नहीं पाये, कांग्रेस से अलग हो गये. महागठबंधन के घटक दलों की बढ़ी संख्या के मद्देनजर 2024 के संसदीय चुनाव में भी इस सीट के कांग्रेस (Congress) के कोटे में जाने की संभावना नहीं है. 2019 में अपने जनाधार की थाह वह ले चुके हैं. ऐसे में चुनावी राजनीति से संन्यास लेने के सिवा उनके पास कोई विकल्प नहीं था. दो बार सांसद और तीन बार विधायक रहे डा. शकील अहमद प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और राष्ट्रीय प्रवक्ता भी रहे हैं. बिहार और केन्द्र में मंत्री भी. इतना बड़ा अनुभव तब भी सम्मान नहीं!


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कांग्रेस अध्यक्ष को लिखा खत
डा. शकील अहमद ने हाल – फिलहाल कांग्रेस अध्यक्ष मपन्ना मल्लिकार्जुन खड़गे(Mapanna Mallikarjun Kharge) को पत्र‌ लिख अपनी बेबसी का इजहार किया. कहा कि अब वह चुनाव नहीं लड़ेंगे. लोकसभा का न विधानसभा का. कांग्रेस के प्रति समर्पित रह सिर्फ उसी की राजनीति करेंगे. क्या करेंगे क्या नहीं, यह भविष्य की बात है. वैसे, इसके अलावा फिलहाल उनके समक्ष कोई विकल्प भी नहीं है . डा. शकील अहमद में चुनाव से विरक्ति की वजह क्या है यह तो समझ ही गये होंगे, देर सबेर ऐसी ही विरक्ति तारिक अनवर में भी पैदा हो जाये तो चौंकने – चौंकाने वाली वह कोई बात नहीं होगी. कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव तारिक अनवर कटिहार संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते हैं. 1980 से 2019 तक के ग्यारह चुनावों में कभी कांग्रेस तो कभी राकांपा (NCP) के उम्मीदवार रहे हैं.

तब क्या करेंगे ?
इस बार यानी 2024 के चुनाव के जो परिदृश्य(Scene) उभर रहे हैं ‌उसमें उनका हित अघोषित(Undeclared) नये राजनीतिक चरित्र वाली कांग्रेस के ‘अर्द्ध हिन्दुत्व ‘ की भेंट चढ़ जा सकता है. इसको ऐसे समझिये, कटिहार से अभी दुलालचंद गोस्वामी(Dularchand Goswami) जदयू के सांसद हैं. 2019 में तारिक अनवर को इन्होंने ही मात दी थी. वर्तमान में जदयू (JDU) महागठबंधन का हिस्सा है. सिटिंग होने के नाते पहला दावा उसी का होगा. तारिक अनवर के लिए वह उदार हो जाये, तो अलग बात होगी. अड़ गया, तो फिर क्या होगा? उस स्थिति में तारिक अनवर क्या करेंगे? विश्लेषकों ‌की समझ है कि चुनाव से अलग रखने की स्थिति में डा.शकील अहमद की तरह यही क्या उनमें भी विरक्ति(Detachment) भर दे ‌सकता है. वैसे, चुनाव में अभी वक्त है. इस दरम्यान राजनीतिक हालात में काफी बदलाव आ सकते हैं.

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