तापमान लाइव

ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल

शराबबंदी : 30 हजार करोड़ की समानांतर अर्थव्यवस्था !

शेयर करें:

विष्णुकांत मिश्र
01 दिसंबर 2023

Patna : शराबबंदी की सफलता को नीतीश कुमार 2016-17 के एक सर्वेक्षण का हवाला दे इस रूप में व्याख्यायित करते हैं कि शराब के शौकीन 01 करोड़ 64 लाख लोगों ने इसका सेवन बंद कर दिया. इससे उन परिवारों का जीवन बेहतर हुआ. महिलाओं पर घरेलू हिंसा कम हुई. खान-पान और बच्चों की पढ़ाई पर लोग ज्यादा खर्च करने लगे. इससे सरकार का राजस्व बढ़ा. फटे पायजामे पर पैबंद! वैसे भी ये आंकड़ें 2016-17 के हैं. वह शराबबंदी (Liquor ban) का शुरुआती दौर था. कानून की अतिकठोरता का भय बना हुआ था. शराब की अवैध उपलब्धता सीमित थी. वर्तमान में भी वैसा है क्या?

सवाल भाजपा की भूमिका पर भी
विपक्ष की भूमिका में आयी भाजपा इसी परिप्रेक्ष्य में शराबबंदी की समीक्षा की बात कर रही है तो नीतीश कुमार भाग क्यों रहे हैं? बौखला और झल्ला क्यों जा रहे हैं? सवाल भाजपा की भूमिका पर भी है. अगस्त 2022 से पहले वह नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के साथ सत्ता में थी. समीक्षा की बात उस दौरान क्यों नहीं उठायी गयी? जो हो, यहां यक्ष प्रश्न यह है कि साढ़े छह लाख लोगों की गिरफ्तारी, पांच लाख से ज्यादा प्राथमिकी, ढाई करोड़ लीटर से अधिक देसी-विदेशी शराब की बरामदगी के बावजूद शराब का प्रवाह बना हुआ है, तो फिर शराबबंदी की सार्थकता क्या रह जाती है?

हलकान है अदालत
इससे जुड़े 40 हजार से अधिक लोग जेल में हैं. ऐसे मामलों में सजा की दर भी काफी कम है. पकड़े गये लोगों में पुलिस पांच प्रतिशत से कम को ही सजा दिला पाती है. हजारों मामलों के लंबित रहने से अदालत (Court) हल्कान-परेशान है सो अलग. इस परेशानी की बाबत राज्य सरकार को कई बार फटकार भी लगा चुकी है. इन सबको नजरंदाज कर सिर्फ अपनी जिद में सालाना लगभग सात हजार करोड़ के राजस्व का नुकसान उठा शराब माफियाओं और उनके संरक्षकों की तिजोरियों का आकार बढ़ाना कौन सी अकलमंदी है?

बिहार में शराब विनिष्टीकरण का एक दृश्य.

सरकार के खाते में कुछ नहीं
कठोर कानून को ठेंगा दिखा लोग शराब पर दोगुना-तिगुना खर्च कर रहे हैं. नीतीश कुमार की सत्ता के घोषित उत्तराधिकारी उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) ने ही कुछ माह पूर्व कहा था कि शराब माफियाओं ने तीस-चालीस हजार करोड़ की समानांतर अर्थव्यवस्था (Parallel Economy) खड़ी कर ली है. सरकार के खाते में कुछ नहीं आ रहा है. वर्तमान में तेजस्वी प्रसाद यादव की सत्ता में बड़ी भागीदारी है.इस मुद्दे को उपमुख्यमंत्री के रूप में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समक्ष उठायेंगे?


ये भी पढें :
‘शाही जिद’ में समा गया राज्य का आर्थिक हित!
राजा ने किया मजाक उनकी जान निकल गयी…
फिर अलाप रहे बेसुरा राग !
मजबूत हुई माफियागिरी !


जिन गलियों में…
निदा फाजली की पंक्तियां हैं-
दिनभर धूप का पर्वत काटा,
शाम को पीने निकले हम.
जिन गलियों में मौत बिछी थी,
उनमें जीने निकले हम.
संदर्भ जो रहा हो, बिहार में अभी बहुत कुछ वैसी ही स्थिति है. शराबबंदी के बावजूद मौत बिछी गलियों में जीने निकल जा रहे लोग परिवार के लिए लंबे समय तक साथ रहने वाले दर्द छोड़ जा रहे हैं.

पिला रहा मौत का घूंट
दलित और अतिपिछड़ा वर्ग के ऐसे लोग बेहद गरीबी में गुजर-बसर करते हैं. शराबबंदी कानून की अतिकठोरता का दंश यही वर्ग झेलता है. जहरीली शराब के रूप में मौत भी इसी तबके के लोगों को निवाला बनाती है. इसे विडम्बना ही कहेंगे कि जिनकी जलालत भरी जिंदगी में उजाला फैलाने के लिए शराबबंदी कानून लाया गया, वही कानून उन्हें मौत का घूंट पिला रहा है!

#Tapmanlive

अपनी राय दें