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अद्भुत कला-परम्परा है जल रंगों की

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अवधेश अमन

स समय के कलाकार हैं नरेंद्र मिश्र (Narendra Mishra) जब जल-रंग का सृजन अनुभव चाक्षुष कला में बहुत अर्थवान हुआ करता था. साठोत्तरी के बाद तक भारत में जल रंगों से ही चित्र-सृजन प्रमुख था. यद्यपि यूरोपीय कला आंदोलन के प्रभाव के कारण कैनवास पर तैल रंगों से यहां बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशक से ही चित्रांकन हो रहा था. मगर भारत में ब्रितानी हुकूमत (British Rule) के समय यहां आ रहे ब्रितानी चित्रकारों ने भारत के कलाकारों को मुख्य रूप से कैनवास पर शबीह (पोट्रेट) की रचना का यथासंभव ज्ञान कराया और तैल रंगों से कैनवास पर ज्यादातर चित्रकार पोट्रेट ही बनाते रहे. लेकिन, उन दिनों भी नरेंद्र मिश्र सरीखे कलाकार कागज पर जल रंगों से ही चित्रांकन करते रहे. नरेंद्र मिश्र बिहार के लखीसराय (Lakhisarai) जिले के माणिकपुर (लक्ष्मीपुर) गांव से पटना आये थे. यहां के कला एवं शिल्प महाविद्यालय से ललित कला विषय के अध्ययन के लिए और फिर अंततः पटना (Patna) में ही बस गये.

बुद्ध का जीवन प्रिय विषय
माणिकपुर गांव सूर्यगढ़ा प्रखंड में है. 1963 में ललित कला की स्नातक स्तर की शिक्षा पूरी करने के पश्चात नरेंद्र मिश्र केंद्रीय विद्यालय (Central School) की सेवा में कला विषय के शिक्षक के रूप में आ गये और अपनी अध्यापकीय व्यस्तता के बावजूद इन्होंने अपने सृजनात्मक कार्य (Creative Work) को निरंतर जारी रखा. उन दिनों वाश पेंटिंग में बुद्ध का जीवन इनका प्रिय विषय था. ‘उमर खैय्याम’ को भी इन्होंने मनोयोग से चित्रांकित किया. इनकी जल-रंगीय संरचनाओं में ग्राम्य जीवन के दृश्य-परिदृश्य भी चित्रांकित होते रहे. यह अब भी उन दिनों के वाट्समैन पेपर, विनसर न्यूटन के रंग और ब्रश को भूलते नहीं हैं. इनका मानना है कि इन साधनों से जल रंगों के चित्रांकन की सघन अनुभूति होती है, जिनमें परम आनन्द का उत्कर्ष भी होता है.

हृदयग्राही चित्रांकन
भारत में इधर के विगत दो दशकों में बहुत बड़ी संख्या में जल रंगों से चित्रांकन किये गये हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि जल रंगों की एक आत्मीय कला-परम्परा लौट रही है. हालांकि, आज की कला में विविध अनर्गल प्रयोगों की अराजकता भी है. बावजूद इसके अजमेर के राम जायसवाल, इलाहाबाद के श्यामबिहारी अग्रवाल, लखनऊ के राजेन्द्र प्रसाद, राजीव मिश्र और हैदराबाद के शिवकुमार तथा सिराज एस. के. सरीखे अनेक कलाकार जल रंगों से हृदयग्राही चित्रांकन कर रहे हैं. ये बहुत समय-साध्य वाश पेंटिंग चित्रांकन भी कर रहे हैं. पटना के नरेंद्र मिश्र भी इसी विशिष्ट परम्परा के कलाकार हैं. इन्होंने बातचीत के दरम्यान बिहार (Bihar) के अपने समकालीन चित्रकार भुवनेश्वर यादव तथा आनंदी प्रसाद बादल की वाश पेंटिंग की विशेषताओं और उनकी सृजन प्रक्रिया (Creation Process) को याद किया.


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प्रवाहमय अनुभव
साथ ही विज्ञ कला अध्यापक बटेश्वरनाथ श्रीवास्तव तथा अवधेश कुमार सिन्हा की वाश पेंटिंग को भी याद कर ये रोमांचित हो गये. इनकी चित्रशाला में तैल रंग और कैनवास केवल पोट्रेट के लिए होते हैं. इनके यहां जल रंगों के संसाधनों की विविधताएं हैं. ये जल रंगों को जब तूलिका से मिश्रित करते हैं तब प्रकृति के विविध रंगों का प्रवाहमय अनुभव इन्हें होता है. जब रंग कागज के फलक पर अपनी विविध प्रकाशयुक्त रंगतें लेकर उभर रहे होते हैं तब सृजनात्मकता और इसकी गत्यात्मकता का एक अतीन्द्रिय सुख (Sensual Pleasure) इन्हें प्राप्त होता है, जिन्हें कोई प्रेक्षक भी अनुभव कर सकता है संरचना के अन्तर्भाव के साथ.

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