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लालू – राबड़ी शासन को ‘जंगल राज’ की संज्ञा दिलाने वाला यह मामला…!

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विशेष संवाददाता
16 फरवरी 2024

Patna : बिहार की राजनीति में लगभग दो दशकों से ‘जंगल राज’ की चर्चा खूब हुआ करती है. विधि -व्यवस्था थोड़ी -सी बिगड़ती नहीं है कि विपक्षी नेताओं के साथ-साथ आमलोग ‘जंगल राज’ लौटने की बात करने लग जाते हैं. पर, यहां एक अपवाद भी है. विपक्ष में रहते हुए भी राजद नेताओं के मुंह से ‘जंगल राज’ शायद ही कभी निकलता है. ऐसा क्यों? यह खुद समझने की बात है, बताने की नहीं. तमाम जागरूक लोगों को यह अच्छी तरह मालूम है कि संगठित अपराध (Organized Crime) के फन काढ़ लेने और कथित रूप से कानून के शिथिल रहने के कारण लालू -राबड़ी शासन काल को ‘जंगल राज’ कहा जाता था.

मिलते हैं तब ‘किरिया’ खाते हैं
पर, यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि आखिर उस शासनकाल को ‘जंगल राज’ की संज्ञा किसने, कब और क्यों दी थी? आम समझ में ऐसी संज्ञा देने वाले उस कालखंड के विपक्ष के नेता होंगे. पर, राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद (Lalu Prasad) से गले मिलने पर नीतीश कुमार ‘किरिया’ खाते हैं कि उन्होंने कभी ऐसी टिप्पणी नहीं की. लोभ जो रहा हो, जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने भी हाल फिलहाल इसे ‘राजनीतिक स्टंट’ बता इससे पल्ला झाड़ लिया था. नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के ‘किरिया’ खाने और ललन सिंह के पल्ला झाड़ लेने का तात्पर्य क्या था? यही न कि ऐसी बातें वे और जद यू के लोग नहीं, भाजपा के लोग किया करते थे.

भूत की तरह पीछे पड़ गया
हैरानी इस बात की कि उन दोनों के मुंह से यह सच भी नहीं निकला कि ‘जंगल राज’ की संज्ञा विपक्ष के किसी नेता ने नहीं, पटना उच्च न्यायालय ने दी थी. जानकारों के मुताबिक अपने किसी फैसले में उसने ऐसी कोई लिखित टिप्पणी (Written Comment) दर्ज नहीं की थी, एक बहुचर्चित मामले में सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से ऐसा कहा था. विरोधी दलों के नेताओं ने उसे लपक लिया और फिर ‘जंगल राज’ लालू प्रसाद और राजद की राजनीति के पीछे भूत की तरह पड़ गया. विधि-व्यवस्था में गिरावट पर सरकार पर प्रहार का अचूक हथियार (Perfect Weapon) बन गया.

कोई खास प्रगति नहीं
यहां जानने वाली बात यह भी है कि पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) की ऐसी टिप्पणी विधि- व्यवस्था से जुड़े किसी मामले में नहीं, कथित रूप से चारा और अलकतरा घोटाला काल के लगभग समानांतर हुए बहुचर्चित मस्टर रोल घोटाले से संबद्ध मामले में हुई थी. मस्टर रोल घोटाला 1996 का है. 28 साल पहले सार्वजनिक हुआ था. उसको लेकर 1997 में पटना उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर हुई थी. न्यायमूर्ति बीएम लाल उस वक्त पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे. उसी दौरान मस्टर रोल घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश पारित हुआ था. आदेश के पारित हुए लगभग 27 साल हो गये. मामले में कोई खास प्रगति नहीं हुई है.

नौ दिन चले ढाई कोस
उधर चारा और अलकतरा घोटालों की जांच पूरी हो गयी, सुनवाई के बाद अभियुक्तों को सजा सुना दी गयी. आरोप सिद्ध घोटालेबाज सजा काट रहे हैं. मस्टर रोल घोटाले की जांच की स्थिति नौ दिन चले ढाई कोस वाली बनी हुई है. यह घोटाला (Scam) तब उजागर हुआ था जब बिहार और झारखंड एक था. जानकारों की मानें, तो ग्रामीण दैनिक रोजगार सृजन की योजनाओं में रोज कमाने खाने वाले दिहाड़ी मजदूरों का मस्टर रोल टी सी 49 (बिहार कोषागार संहिता टी सी 49 मस्टर रोल) ही असली घोटाला है.

मस्टर रोल है ही नहीं!
यहां गौर करने वाली बात है कि मजदूरों का पलायन (Migration of Workers) रोकने के लिए देश में 1980 से विभिन्न नामों से केन्द्र प्रायोजित राष्ट्रीय ग्रामीण दैनिक रोजगार सृजन योजनाएं चल रही हैं. योजनाओं के नाम बदलते रहे हैं, पर घोटाले की प्रकृति लगभग समान रही है. मस्टर रोल घोटाले की जांच को अंतिम मुकाम तक ले जाने के लिए 27 वर्षों से एकनिष्ठ भाव से जुटे साहिबगंज निवासी कुमार कुंदन कुसुम के अनुसार रोजगार (Employment) योजनाओं के मूल अभिलेख कैश बुक में रोजगार देने के प्रामाणिक दस्तावेज का अभाव है. केन्द्रीय लोक निर्माण लेखा संहिता के फार्म 21 तथा बिहार कोषागार संहिता टी सी 49 ( 2011 के बाद टी सी 32 ) का अनुपालन नहीं हुआ है.

दर्ज हुई थीं 12 प्राथमिकियां
घोटाले का पर्दाफाश सबसे पहले साहिबगंज में हुआ. बाद में इसका राज्यव्यापी स्वरूप सामने आया. इस संदर्भ में 1996 में साहिबगंज और पाकुड़ जिलों के विभिन्न थानों में 12 प्राथमिकियां दर्ज हुईं. समुचित कारर्वाई नहीं हुई, तो मामला पटना उच्च न्यायालय में गया. मुख्य न्यायाधीश बी एम लाल और न्यायाधीश एस के सिंह की दो सदस्यीय खंडपीठ ने 30 नवम्बर 1998 को करोड़ों में अनुमानित इस घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश पारित किया. मानिटरिंग का जिम्मा न्यायाधीश एस एन झा और न्यायाधीश एस जे मुखोपाध्याय की उसी समीक्षा पीठ को दिया गया जो बहुचर्चित चारा एवं अलकतरा घोटालों (Fodder and Alcatraz Scams) की सीबीआई (CBI) जांच की मानिटरिंग कर रही थी.


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सब घोरमट्ठा हो गया
सीबीआई ने मस्टर रोल घोटाले की जांच शुरू की, पर उसे अंतिम मुकाम तक नहीं ले जा सकी. पटना, रांची और धनबाद में कुछ मामले दर्ज हुए. धनबाद की सीबीआई की विशेष अदालत में दो- तीन मामलों में अभियोग पत्र भी दाखिल हुए. याचिकाकर्ता कुमार कुन्दन कुसुम का आरोप है कि इसके अलावा और कहीं कुछ नहीं हुआ. उस वक्त बिहार में 55 जिला थे. सीबीआई की जांच सभी जिलों में होनी चाहिए थी, नहीं हुई. भारत के नियंत्रक – महालेखापरीक्षक की नमूना रिपोर्ट में भी मस्टर रोल में अनियमितता की बात कही गयी है. इसके बावजूद कोई कारवाई नहीं हुई. सब घोरमट्ठा हो गया! घोटाला अब भी उसी रफ्तार में हो रहा है.

मामला अवमानना का
इन मुद्दों को लेकर कुमार कुन्दन कुसुम फिर पटना उच्च न्यायालय में गये. सीबीआई समेत तमाम संबद्ध अधिकारियों के खिलाफ अवमानना का मामला दायर किया. उच्च न्यायालय के तत्संबंधित आदेश का मुकम्मल अनुपालन नहीं होने का तर्क रखा. उच्च न्यायालय ने उनके तर्क को तो सुना, पर तकनीकी आधार पर अवमानना याचिका (Contempt Petition) को खारिज कर दिया. कुमार कुन्दन कुसुम (Kumar Kundan Kusum) का कहना है कि इस मुद्दे को वह अब सर्वाेच्च अदालत में ले जायेंगे. आगे क्या होता है क्या नहीं, यह भविष्य की बात है, फिलहाल कुमार कुन्दन कुसुम के अथक प्रयास की सराहना (Appreciate) तो होनी ही चाहिए.

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