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‘अदृश्य’ क्यों हैं नीतीश कुमार?

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विशेष संवाददाता
28 मार्च 2024

Patna : संसदीय चुनाव की रणभेरी बज गयी है. राजनीतिक (Political) दलों के उम्मीदवार और उनके समर्थक-कार्यकर्ता लाव-लश्कर के साथ अपने-अपने क्षेत्र में मोर्चा संभाल रहे हैं. प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों को जमीन सूंघा देने की नेतृत्व निर्धारित रणनीति पर अमल कर रहे हैं. अन्य दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं बड़े नेता सामाजिक सूत्र के सहारे चुनावी गणित सुलझा रहे हैं. राज्य (State) और क्षेत्र के स्तर पर नेताओं का समूह उनका अनुसरण कर रहा है. इन सबके बीच लोग यह देख-सुन चकित हैं कि सत्तारूढ़ जदयू (JDU) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) लोकतंत्र के इस उत्सव से ओझल क्यों हैं?

अलग-थलग क्यों हैं?
बात क्या है कि राज्य मंत्रिमंडल के बहुप्रतीक्षित विस्तार के बाद से आम लोगों को सार्वजनिक तौर पर उनका दर्शन नहीं हो रहा है? उनकी ‘गैरमौजूदगी’ की वजह से राजग (NDA) में सीटों का बंटवारा और जदयू के सोलह उम्मीदवारों की उत्साहहीन घोषणा एक तरह से औपचारिकताओं में सिमटी दिखी. सीटों के बंटवारे वाली बैठक में जदयू का प्रतिनिधित्व संजय झा (Sanjay Jha) ने किया तो जदयू के उम्मीदवारों की घोषणा वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashistha Narayan Singh) ने की. यह सामान्य जन की समझ में नहीं आया. दिमाग में अनेक प्रकार के सवाल उठने-कौंधने लगे. यह भी कि नीतीश कुमार (Nitish Kumar) आखिर अलग-थलग क्यों पड़े हुए हैं?

साल रही है यह चिंता
मंत्रिमंडल के विस्तार और सीटों के बंटवारे में भाजपा (BJP) नेतृत्व की कथित दखलंदाजी से तो वह नाराज नहीं हैं? खासकर उनकी नापसंदगी के बावजूद चिराग पासवान (Chirag Paswan) को पांच सीटें देने और पशुपति कुमार पारस (Pashupati Kumar Paras) को राजग से अलग हो जाने को बाध्य कर दिये जाने का तो गुस्सा नहीं है? ये सब मुद्दे तो हैं, पर नीतीश कुमार के परिदृश्य से ओझल रहने का कारण सिर्फ यही नहीं है. सबसे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि ‘भूंजा पार्टी’ के दबाव में उन्होंने जदयू के आंतरिक सर्वेक्षण में कार्य-उपलब्धियों के मामले में ‘फिसड्डी’ पाये गये पांच वर्तमान सांसदों की उम्मीदवारी का दोहराव तो कर दिया, पर ‘भूल’ का अहसास हुआ तब उनकी गति-दुर्गति की चिंता उन्हें गहरे रूप से सालने लगी है.


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तनाव से दूर रहने की हिदायत
सच क्या है यह पार्टी नेतृत्व ही बता सकता है, जदयू के गलियारे में वैसे सांसदों में झंझारपुर (Jhanjharpur) के रामप्रीत मंडल, सुपौल (Supaul) के दिलेश्वर कामत, बांका (Banka) के गिरधारी यादव, भागलपुर (Bhagalpur) के अजय कुमार मंडल और जहानाबाद (Jehanabad) के चंदेश्वर चंद्रवंशी की चर्चा है. इनमें चार अतिपिछड़ा वर्ग से आते हैं. जदयू के अंदरूनी सूत्रों की मानें, तो अतिपिछड़ा के नाम पर नीतीश कुमार इन पर दांव तो खेल गये, पर अब उनकी हार की आशंका ने दिमागी तौर पर उन्हें इस कदर परेशान कर रखा है कि चिकित्सकों की हिदायत मानने को बाध्य होना पड़ गया है. चिकित्सकों की हिदायत और कुछ नहीं, तनाव से दूर रहने की है.

केजरीवाल भी गये थे
वैसे भी हाल की विदेश यात्रा के बाद से नीतीश कुमार का स्वास्थ्य कुछ अधिक डगमगाया-सा नजर आ रहा है. वह और उनके करीब रहने वाले लोग भले इसे स्वीकार नहीं करें, मुख्यमंत्री आवास से खबर कुछ ऐसी ही छनकर आ रही है. बहरहाल, सामान्य चिकित्सा तो हो ही रही है, बताया जाता है कि विदेश यात्रा से लौटने के बाद नीतीश कुमार बेंगलुरु के एक प्रसिद्ध चिकित्सालय में इलाज कराने गये थे. कारगर इलाज के लिए इस चिकित्सालय का खूब नाम है. जानकार बताते हैं कि प्राकृतिक पद्धति से इलाज वाले इस अस्पताल में मौका-बेमौका खांसते रहने वाले दिल्ली (Delhi) के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने भी इलाज कराया था.

उतर गया गुलूबंद
फायदा इस रूप में हुआ कि गर्मी के मौसम में भी गले से लिपटे रहने वाला गुलूबंद उतर गया. ऐसा कि जाड़े के मौसम में भी नहीं दिखता है. कामना कीजिये, अपने मुख्यमंत्री भी जल्द दुरुस्त व तंदुरुस्त होकर ‘लोकतांत्रिक उत्सव’ का हिस्सा बन सियासी हलकों की बेचैनी मिटा दें. इतना कुछ से तो समझ ही गये होंगे कि नीतीश कुमार चुनावी परिदृश्य से अदृश्य क्यों हैं.

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