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हीना शहाब : बदल गया हवा का रुख

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वंदना मिश्र
21 मई 2024

Siwan : राजद को पूर्णिया (Purnia) की आक्रामकता से जितनी फजीहत नहीं हुई थी उससे कहीं अधिक सीवान (siwan) की शालीनता चुभ रही है. राजद के अघोषित सुप्रीमो तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejashwi Prasad Yadav) ‘प्रणाम पूर्णिया’ से त्रस्त हो गये, तो ‘प्रणाम सीवान’ ने उन्हें संत्रस्त कर रखा है. रात की बात छोड़ दें, दिन के उजाले में भी कुछ सूझ नहीं रहा है. वैसे, पूर्णिया और सीवान के चुनावी मुकाबलों में थोड़ा फर्क है. पूर्णिया की आक्रामकता में छिछोरापन था, सीवान की शालीनता में गंभीरता है. यह गंभीरता दूसरे समुदाय को भी आकर्षित कर रही है. गौर करने वाली बात यह भी है कि पूर्णिया की तरफ बेइज्जती का कोई अर्थ नहीं है. दुत्कार-दर दुत्कार के बाद भी निकटता पाने की निर्लज्जता है. यही निर्लज्जता अविश्वसनीयता का आधार बनी हुई है.

छिटक गया है मुसलमान
सीवान में स्वाभिमान है. उपेक्षा की सीमा पार हुई, तो मुंह फेर लिया. फिर उस ओर कभी देखा नहीं. अवाम आश्वस्त है कि चुनाव के बाद भी रूख ऐसा ही रहेगा. उधर, क्या होगा, क्या नहीं, दूसरों को छोड़ दीजिये खुद उन्हें भी नहीं मालूम. इसके बाद भी ‘माय’ वहां आक्रामकता को समर्पित दिखा, यहां स्पष्ट रूप से विभाजित है. यह कहें कि ‘माय’ से मुस्लिम छिटक गया है तो वह किसी भी दृष्टि से गलत नहीं होगा. विश्लेषकों का आकलन है कि बगैर किसी शोर शराबे के मुस्लिम समुदाय का मुकम्मल साथ निर्दलीय प्रत्याशी हीना शहाब (Independent candidate Heena Shahab) को मिल रहा है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि इस समुदाय के लोग इसे राजद नेतृत्व द्वारा की गयी हीना शहाब की उपेक्षा के प्रतिरोध का माकूल अवसर मान रहे हैं. बड़ी बेसब्री से 25 मई 2024 का इंतजार कर रहे हैं. उसी तारीख को यहां मतदान होना है.

हीना शहाब का चुनाव अभियान.

सवाल के रूप में जवाब
यह तर्क मुस्लिम समुदाय के गले नहीं उतर रहा है कि लगातार हार की वजह से हीना शहाब को उम्मीदवारी से वंचित कर दिया गया. मुसलमानों (Muslims) के पास इस तर्क का सवाल के रूप में जवाब है. पाटलिपुत्र संसदीय क्षेत्र में लगातार हारने के बाद भी मीसा भारती (Misa Bharti) को उम्मीदवार क्यों बना दिया गया? विश्लेषकों का मानना है कि जदयू (JDU) नेतृत्व ने भी जाने अनजाने हीना शहाब का मार्ग लगभग प्रशस्त कर दिया है. हालांकि, बात बहुत पुरानी हो चुकी है तब भी लोग उसकी चर्चा करते हैं. जदयू की उम्मीदवारी पूर्व विधायक रमेश सिंह कुशवाहा (Ramesh Singh Kushwaha) की पत्नी विजयलक्ष्मी (Vijayalakshmi) को मिली है. रमेश सिंह कुशवाहा के बारे में बताया जाता है कि सीवान में भाकपा- माले (CPI-ML) की नींव इन्होंने ही रखी थी. उसके बाद के रक्तरंजित दौर में संपन्न लोगों, खासकर सवर्णों पर टूटा कहर लोगों के जेहन से मिटा नहीं है. यह भी कि उस खूनी दौर से त्राण कथित तौर पर शहाबुद्दीन ने ही दिलाया था.


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तब भी कमजोर नहीं
रमेश सिंह कुशवाहा की पत्नी को एनडीए (NDA) की उम्मीदवारी मिलने से उस तबके की स्वतःस्फूर्त सहानुभूति और समर्थन शहाबुद्दीन (Shahabuddin) की पत्नी हीना शहाब को मिलता दिख रहा है. हालांकि, इससे उन्हें मजबूती कितनी मिलेगी और जदयू उम्मीदवार को नुकसान कितना होगा, यह कहना कठिन है. वैसे, विजयलक्ष्मी की संभावना को भी कमजोर नहीं माना जा सकता. इसलिए कि नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) से प्रभावित तबके का साथ तो उन्हें मिलना ही है. बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष अबध बिहारी चौधरी (Abadh Bihari Chaudhary) राजद (RJD) के उम्मीदवार हैं. सांसद बनने की उनकी लम्बी चाहत है. उम्मीदवारी पहली बार मिली है. चाहत पूरी हो पायेगी, इसमें संदेह है. मुस्लिम मतदाता तो राजद से दूर -दूर दिख ही रहे हैं, यादव समाज का एक बड़ा तबका हीना शहाब के साथ हो गया है.

जीवन यादव भी हैं
यादव मतों के दूसरे दबंग हिस्सेदार जीवन यादव (Jeevan Yadav) भी मैदान में हैं, खूब जोर लगा रहे हैं. जीवन यादव खुद जीतें या नहीं, अबध बिहारी चौधरी की हार का आधार तो खड़ा कर ही दे सकते हैं. बहरहाल, हीना शहाब की यह बात सामान्य लोगों को खूब भा रही है कि शहाबुद्दीन के अधूरे सपने को साकार करने के लिए जनता के आदेश पर वह निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरी हैं. इन सबके बावजूद लगातार तीन हार के बाद जीत हासिल हो पाती है या नहीं, देखना दिलचस्प होगा.

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