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Bihar Politics : बांंकीपुर और बिहार : टूट गया तिलिस्म… मिल गया विकल्प?

शिवकुमार राय
10 अगस्त 2026
Patna : बांकीपुर (Bankipur) विधानसभा क्षेत्र में कायस्थ (Kayastha) मतदाताओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है. ऐसा चुनावी राजनीति की जानकारी रखने वाले कहते हैं. चूंकि इसका कहीं कोई प्रामाणिक आंकड़ा नहीं है इसलिए इसको मानना पड़ जायेगा. लेकिन, इसके साथ यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि कायस्थ समाज का मतदान प्रतिशत परम्परागत रूप से दूसरी जातियों की तुलना में काफी कम रहता है. सिर्फ इसी का नहीं, कमोबेश सवर्ण समाज की अन्य जातियों का भी. खास कर शहरी क्षेत्रों में. पहले मतदाताओं के जातीय आंकडों पर नजर डालते हैं. ये आधिकारिक नहीं, अनुमान पर आधारित लगभग में हैं. इन आंकड़ों में कायस्थ 14 प्रतिशत, यादव 12, मुस्लिम 09, चंद्रवंशी 09, वैश्य 09, दलित 08, भूमिहार 08, ब्राह्मण 07, राजपूत 05, कुर्मी 05, कुशवाहा 03 और अन्य जातियों के 11 प्रतिशत मत हैं. अन्य जातियों में धानुक मत अधिक हैं.

विश्लेषण भर के लिए इन आंकड़ों को सही मान लें, तो इससे साफ झलकता है कि बांकीपुर में चुनाव परिणाम को प्रभावित करने जैसी मत-बहुलता किसी एक जाति की नहीं है. कायस्थ ज्यादा संख्या में हैं, तो उनमें चुनावी मुखरता का अभाव दिखता रहा है. उपचुनाव (By-election) में राजनीतिक दलों (Political parties) को सामाजिक समूहों के समर्थन की बात करें, तो सामान्य धारणा में सवर्ण, वैश्य, गैर यादव पिछड़ी जातियों तथा अतिपिछड़ों व दलितोँ के बड़े हिस्से को एनडीए (NDA) समर्थक माना जाता है. यादवों और मुसलमानों की पहचान राजद (RJD) समर्थक की रही है. वैसे, पिछड़ों- अतिपिछड़ों और दलितों के एक तबके में लालू प्रसाद (Lalu Prasad) के ‘सामाजिक न्याय’ का प्रभाव अब भी मौजूद है. चुनावों में इसकी झलक दिखती रहती है

मोटा – मोटी यही है बिहार में सामाजिक यानी जातीय समूहों का राजनीतिक समीकरण. इसमें कांग्रेस (Congress) और वामपंथी दलों (Left parties) ने भी अपने – अपने आधार क्षेत्र में पैठ बना रखी है. थोड़ा – बहुत इधर – उधर के साथ मतदान का जातीय स्वरूप आमतौर पर ऐसा ही कुछ रहा करता है. मतों की गोलबंदी मुख्यतः एनडीए बनाम महागठबंधन (NDA Banam Mahagathbandhan) के रूप में होती है. एनडीए यानी जदयू (JDU) और भाजपा (BJP) तथा महागठबंधन यानी राजद, कांग्रेस और वामदलों से है. बांकीपुर उपचुनाव में ऊपरी तौर पर एनडीए में एकजुटता दिखी, पर आधार मतों में अंदरूनी दरार, कमजोर उम्मीदवार और उम्मीदवारी की आकांक्षा रखने वालों के भीतरघात की वजह से मज़बूत गढ़ में भी भाजपा का बंटाधार हो गया.

उधर, महागठबंधन बिखरा- बिखरा नजर आया. इसका असर राजद के औंधे मुंह गिर जाने के रूप में दिखा. जीत जन सुराज (Jan Suraj) की हुई जिसकी सामाजिक समूहों पर आधारित परम्परागत राजनीतिक समीकरण में कोई जगह नहीं थी. इसको थोड़ा और स्पष्ट करें तो जन सुराज को किसी भी सामाजिक समूह का खुला समर्थन प्राप्त नहीं था. इसके बाद भी एनडीए और महागठबंधन के सामाजिक समीकरणों को छिन्न – भिन्न कर जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर जीत गये, तो तात्कालिक तौर पर इसे ‘तीसरा विकल्प’ माना जा सकता है. इस मुद्दे पर बात फिर कभी, फिलहाल चर्चा इस बात की कि प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की राजनीति को चौंका देने वाली जीत कैसे हो गयी?

इस पर तरह- तरह के मंतव्य – वक्तव्य पढने- सुनने को मिल रहे हैं. मसलन गैर कायस्थ सवर्ण समाज भाजपा को छोड़ प्रशांत किशोर के साथ हो गया. धानुक- कुर्मी के मत जन सुराज को इसलिए मिल गये कि नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को मुख्यमंत्री (Chief Minister) पद से मुक्त कर दिये जाने से उनमें नाराजगी थी. चंद्रवंशी समाज के मत जन सुराज के स्वजातीय नेता से प्रभावित हो गये. यादव और मुस्लिम मतों की गोलबंदी प्रशांत किशोर के पक्ष में हो गयी. ऐसे और भी कई तरह के तर्क. इन तर्को को आधारहीन नहीं कहा जा सकता, पर संपूर्ण सच यही है, यह भी नहीं माना जा सकता. यादव और मुस्लिम मतों की गोलबंदी प्रशांत किशोर के पक्ष में हुई और बड़ी जीत मुख्यतः इसी वजह से हुई, यह अकाट्य है.

जहां तक गैर कायस्थ सवर्ण समाज के समर्थन की बात है तो यूजीसी के नियम एवं अन्य कुछ मसलों को लेकर उसमें नाराजगी थी, पर मुकम्मल रूप में उसका साथ प्रशांत किशोर को मिला, ऐसा दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. वैसा होता तो भाजपा को 44 हजार 827 मत नहीं मिल पाते. हकीकत यह है कि जन सुराज को सिर्फ सवर्ण समाज के ही नहीं, एनडीए समर्थक तमाम सामाजिक समूहों के उन तबकों का साथ मिल गया, जो अलग-अलग कारणों से भाजपा से खार खाये थे. महागठबंधन का तो ‘मौन समर्थन’ था ही. यहां समझने की बात यह भी है कि उपचुनाव सामान्य चुनाव से अलग होता है. इसमें उम्मीदवार का व्यक्तित्व और उसकी लोकप्रियता कुछ अधिक मायने रखती है. इस दृष्टि से एनडीए और महागठबंधन, दोनों के ही उम्मीदवार प्रशांत किशोर की तुलना में कमतर थे. बाजी उनके हाथ लग गयी.

शिवकुमार राय बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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