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आखिर , है क्या बागेश्वर बालाजी धाम?

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बहुचर्चित बागेश्वर बालाजी धाम और पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री से संबंधित किस्तवार आलेख की यह दूसरी कड़ी है :

राजकिशोर सिंह
24 मई 2023
Bageshwar Dham : स्थानीय लोगों के मुताबिक संत बब्बाजी सेतुलालजी महाराज (Saint Babbaji Setulalji Maharaj) के स्वर्गारोहण के बाद भगवान दास गर्ग (Bhagwan Das Garg) मंदिर के मुख्य पुजारी बन गये. धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री (Dhirendra Krishna Shastri) उन्हीं के पौत्र हैं. ऐसा कहा जाता है कि भगवान दास गर्ग ने ही महादेव की मूर्ति के समीप बालाजी यानी हनुमानजी की मूर्ति स्थापित करवायी. उन्हें दादा गुरु भी कहा जाता था. उनके समय से ही शास्त्री परिवार का संबंध इस जगह से हुआ. 1989 में चित्रकूट धाम के निर्मोही अखाड़ा से संन्यास दीक्षा ग्रहण कर भगवान दास गर्ग ने बालाजी की सेवा आरंभ कर दी. उस समय छोटी झोपड़ियों में पूजा-पाठ करते और भक्तों को भभूतिरूपी प्रसाद देते थे. पहली बार 1989 में बहुत बड़ा यज्ञ हुआ. अष्टादशमहापुराण विधि-विधान से संपन्न यज्ञ में अनेक साधु-संतों और महात्माओं की कृपापूर्ण उपस्थिति हुई. 2012 में बागेश्वर धाम सिद्ध पीठ पर दरबार का शुभारंभ हुआ. धीरे-धीरे भक्त जुटने-जुड़ने लगे. भगवान दास गर्ग महाराज अपने तप बल से लोगों की समस्याओं-परेशानियों का निवारण एवं सनातन धर्म (Traditional Religion) पर चलने का मार्गदर्शन करने लगे. इससे बागेश्वर धाम की ख्याति फैलने लगी. भगवान दास गर्ग के चाचा गोले महाराज जी को चश्मा वाले बाबा के नाम से जाना जाता था. ऐसा कहा जाता है कि बालाजी की कृपा सबसे पहले उन्हें ही प्राप्त हुई. प्रारंभ में वह मात्र बेलपत्र ग्रहण कर जंगल में इधर-उधर विचरते रहे और अंततः बागेश्वर धाम बालाजी सरकार के शरणागत हो गये, सिद्धि मिली. ऐसी धारणा है कि इस वंश को बालाजी सरकार की कृपा लगातार मिल रही है.

नौ वर्ष की उम्र से ही रम गये
चश्मा वाले बाबा और भगवान दास गर्ग महाराज के बाद 10 जुलाई 1996 को पैदा हुई गर्ग परिवार (Garg Family) की तीसरी पीढ़ी यानी धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री को गढ़ा वाले बालाजी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त हुआ. मात्र 9 वर्ष की उम्र में ही वह बागेश्वर धाम में रम गये. दादा गुरु भगवान दास गर्ग के निधन के बाद पूर्वजों की अनुभूतियों को अपना कर वह 12 वर्ष की अवस्था से ही दिव्य दरबार लगा रहे हैं. 27 वर्षीय धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के पिता रामकृपाल गर्ग (Ramkripal Garg) खेती के अलावा गांव में पुरोहितई करते थे, सत्यनारायण भगवान की कथा बांचते थे. दान-दक्षिणा से परिवार चलता था. मां सरोज गर्ग (Saroj Garg) घर संभालती थीं. श्रद्धालु अब उनका दर्शन कर भी धन्य हो रहे हैं. धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री के छोटे भाई शालिग्राम गर्ग (Shaligram Garg) जी महाराज भी बालाजी बागेश्वर धाम को समर्पित हैं. एक शादीशुदा बहन भी है.

नौबतपुर का दिव्य दरबार.

दादा से सीखी रामकथा
पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने रामकथा (Ramkatha) अपने दादा से सीखी थी. उनका कहना है कि हनुमानजी और दादा गुरु की कृपा से उन्हें दिव्य अनुभूति होने लगी और वह भी लोगों के दुखों को दूर करने के लिए दिव्य दरबार लगाने लगे. उनके मुताबिक उन्हें हनुमानजी और सिद्ध महाराज के दर्शन भी हुए हैं. वह नौ वर्ष की उम्र से ही बालाजी सरकार (Balaji Sarkar) की भक्ति, सेवा, साधना और पूजा करने लगे थे. इसका ऐसा असर हुआ कि बालाजी की कृपा और दादा गुरु के आशीर्वाद से उन्हें लोगों के मन की बात का पता चलने लगा. बागेश्वर धाम में दिव्य दरबार रात में लगता है. समस्या और समाधान का लंबा दौर चलता है. वैसे तो आशीर्वाद आकांक्षी श्रद्धालुओं (Devotees) का जुटान प्रायः रोज होता है, पर मंगलवार और शनिवार को भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है.


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‘मजिस्ट्रेट हनुमान’
ऐसी धारणा है कि बालाजी सरकार यहां न्यायाधीश (Judge) के रूप में विराजमान है. यहां के हनुमान को ‘मजिस्ट्रेट हनुमान (Magistrate Hanuman)’ कहा जाता है. ऐसा इसलिए कि दिव्य दरबार में कोर्ट-कचहरी जैसी अदालती कार्यवाही होती है. श्रद्धालुओं की मान्यता है कि पूरे विधि-विधान से हनुमान जी की कचहरी में पेशी हुई तो फैसला पक्ष में होना ही है. पेशी में गड़बड़ी पर नकारात्मक फैसले की प्राप्ति होती है. यहां दो तरह की पेशी होती है. पहली पेशी वह जिसे महाराज धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने कथित रूप से अपने आशीर्वाद से दैहिक दैविक भौतिक तापा से छुटकारा दिलाया है उन्हें महाराज जी के निर्देशानुसार पेशी करनी पड़ती है. पर्ची पर उनके ही हस्ताक्षर होते हैं. हस्ताक्षर के रूप में वह ‘श्रीराम’ लिखते हैं. धाम में दूसरी पेशी उन भक्तों की होती है जो पहली बार आते हैं और हनुमान जी के सामने हाजिर होकर अर्जी लगाते हैं.

ऐसे लगती है पर्ची
बागेश्वर बालाजी धाम में अर्जी लगाने का मतलब होता है पर्ची बनना. पर्ची महाराज जी के द्वारा ही बनाया जाता है. उसमें अर्जी (Application) देने वाले द्वारा किसी तरह की कोई जानकारी नहीं दिये जाने के बावजूद उसकी सभी परेशानियों, समस्याओं का कारण (क्या है, कितनी है और कब से है) एवं समाधान लिखा रहता है. इसके लिए उसे एक पर्ची में अपना नाम, मोबाइल फोन नम्बर और निवास स्थान का पता लिखकर लाना होता है. उस पर्ची को एक डिब्बे में डाल दिया जाता है. निर्धारित समय पर एक छोटी कन्या (Little girl) द्वारा डिब्बे से कुछ पर्चियां निकाली जाती है. जिनकी पर्ची निकल गयी उन्हें महाराज जी से मिलने और निश्चित दिन एवं समय पर दरबार में उपस्थित होने का निर्देश उसके मोबाइल फोन पर मिल जाता है. बागेश्वर धाम सरकार से मिलने, उनका ‘आशीर्वाद (Blessings)’ पाने के लिए लोग महीनों प्रतीक्षा करते हैं.

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