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आयेंगे अभी सियासी हवाओं के कई झोंके

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अशोक कुमार
07 फरवरी 2024

Araria : अररिया में अभी राजनीति की जो बयार बह रही है उसमें 2024 के संसदीय चुनाव (Parliamentary Election ) में कुछ नया होने की संभावना नहीं दिख रही है. पूर्व के चुनावों की तरह भाजपा (BJP) और महागठबंधन (Mahagathbandhan) के आवरण वाले राजद (RJD) के बीच आमने-सामने की लड़ाई का ही समां बंध रहा है. चेहरा नये हो सकते हैं, पर मुद्दे पुराने ही होंगे. मतों के ध्रुवीकरण का आधार भी परंपरागत ही होगा. जातीय जनगणना और आरक्षण के कोटे में वृद्धि चुनाव परिणाम (Result) के रुख को मोड़ देगी, वैसा स्पष्ट रूप से कहीं कुछ नजर नहीं आ रहा है. बल्कि दिख यह रहा है कि इन्हें मुद्दा बनाने के नेताओं के प्रयास को मतदाता (Voter) ज्यादा महत्व नहीं दे रहे हैं. राजनीति (Politics) में कुछ विशेष उलटफेर नहीं होने की स्थिति में भाजपा के वर्तमान सांसद प्रदीप सिंह (Pradip Singh) और राजद के पूर्व सांसद सरफराज आलम (Sarfaraj Alam) के बीच भिड़ंत हो सकती है. परिणाम तब की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.

हवा बांध गये ओवैसी
लगभग बराबर के मुकाबले में आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की दखलंदाजी और तसलीम उद्दीन (Taslim Uddin) परिवार में पसरे कलह का असर पड़ा तो ‘कमल’ के कुम्हलाने का खतरा कम हो जायेगा. वैसे, नये राजनीतिक घटनाक्रम में जदयू (JDU) के फिर से राजग का हिस्सा बन जाने से जो उसमें मजबूती आयी है उससे भाजपा की राह आसान हो गयी-सी दिखती है. इस बीच असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Ovaisi) एक हिस्से में हवा बांध सीमांचल (Simanchal) की सियासत में नयी हलचल पैदा कर गये हैं. उनसे पहले कांग्रेस (Congress) के अघोषित सुप्रीमो राहुल गांधी (Rahul Gandhi) धमक दिखा गये हैं. राजद के अघोषित सुप्रीमो तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) भी चक्कर काट गये हैं. इन सबका असर चुनाव में दिखेगा. वैसे, चुनाव में अभी वक्त है. क्या होगा क्या नहीं, यह फिलहाल दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. इसलिए कि अभी चुनावी राजनीति को झकझोरने वाली हवाओं के कई झोंके आयेंगे.

सीमांचल की सभा में असदुद्दीन ओवैसी.

सहेज नहीं पाये पुत्र
अतीत में झांके तो 1967 में अस्तित्व में आये अररिया संसदीय क्षेत्र पर दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री तसलीम उद्दीन का अच्छा खासा प्रभाव था. चुनावों में उनकी अहम भूमिका हुआ करती थी. परिणामों पर उसका असर दिखता था. कमजोरी जिस रूप में हो, विरासत संभाल रहे उनके पुत्र इस ‘प्रभुत्व’ को सहेज नहीं पाये. परिणाम सामने है. कहीं कोई वैसा मान-सम्मान नहीं है, जो होना चाहिये था. भविष्य में क्या होगा, अभी नहीं कहा जा सकता. 1967 से पहले यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी. इस वजह से तस्लीम उद्दीन गृह क्षेत्र को छोड़ पड़ोस के किशनगंज से चुनाव लड़ते थे. कभी हार तो कभी जीत का स्वाद मिलता था.


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तब गिर गये थे औंधे मुंह 
2008 के परिसीमन में यह सीट सामान्य के लिए हो गयी. तसलीम उद्दीन किशनगंज (Kishanganj) से अररिया आ गये. 2009 में यहां के चुनाव (Election) मैदान में उतरे. भाजपा प्रत्याशी प्रदीप सिंह (Pradip Singh) का मुकाबला नहीं कर पाये, औंधे मुंह गिर गये. फिर तो गृह क्षेत्र में उखड़ गये पांव के जमने में पांच साल लग गये. 2013 में जदयू के भाजपा (BJP) से अलग हो जाने से स्थानीय राजनीतिक-सामाजिक समीकरण उनके अनुकूल हो गया. जदयू स्वतंत्र रूप से अखाड़े में उतरा तो 2014 के चुनाव में साम्प्रदायिक आधार पर मतों का ध्रुवीकरण नहीं हो पाया. राजद उम्मीदवार के रूप में जीत तसलीम उद्दीन की हो गयी. लेकिन, दुर्भाग्य कि पांच वर्षों का कार्यकाल वह पूरा नहीं कर पाये. 2019 के चुनाव से लगभग सालभर पहले अल्लाह को प्यारा हो गये. अररिया संसदीय क्षेत्र रिक्त हो गया.

पासा पलट गया 
2018 में उपचुनाव हुआ. उस वक्त जदयू के विधायक रहे तसलीम उद्दीन के मंझले पुत्र पूर्व मंत्री सरफराज आलम (Sarfaraj Alam) को राजद की उम्मीदवारी मिल गयी. सहानुभूति के सहारे भाजपा प्रत्याशी प्रदीप सिंह के मंसूबों को 61 हजार 988 मतों से रौंदते हुए वह लोकसभा में पहुंच गये. सरफराज आलम को 5 लाख 9 हजार मत मिले तो प्रदीप सिंह (Pradip Singh) को 4 लाख 47 हजार 346 मत. लेकिन, 2019 में पासा पलट गया. क्षेत्र के लोगों को भावना में बह जाने की ‘भूल’ का अहसास हो गया. सीधे मुकाबले में प्रदीप सिंह ने सरफराज आलम को 01 लाख 37 हजार 341 मतों के अंतर से परास्त कर दिया. भाजपा की इतनी बड़ी जीत इसलिए भी हुई कि जदयू फिर से उसके साथ हो गया था.

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