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गोड्डा : सेंधमारी का पक्का इंतजाम…तब भी नहीं इत्मीनान !

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विजय कुमार राय
29 मई 2024

Deoghar : अन्य निर्वाचन क्षेत्रों की तरह गोड्डा (Godda) में भी सत्ता विरोधी रूझान के अलावा चुनाव का कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. जातीय समीकरण से ही चुनावी गणित सुलझाये जा रहे हैं. मतदाताओं का कोई जातिवार आधिकारिक आंकड़ा नहीं है‌. अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक गोड्डा में ब्राह्मण मतों की बहुतायत है. संख्या चार लाख के आसपास रहने की बात कही जाती है. 01 लाख के करीब राजपूत, भूमिहार और कायस्थ मतदाता हैं. इस तरह सवर्ण मतों की अनुमानित संख्या 05 लाख के करीब है. इनमें अधिसंख्य भाजपाई मानसिकता के बताये जाते हैं.

बड़ी सेंध लग गयी तब…
चुनावी राजनीति पर गहन नजर रखने वालों की मानें, तो अभिषेक आनंद झा (Abhishek Anand Jha) स्वजातीय मतों में जितनी बड़ी सेंध लगायेंगे, निशिकांत दूबे (Nishikant Dubey) के समक्ष उतना ही बड़ा खतरा खड़ा हो जायेगा और उसी अनुरूप प्रदीप यादव (Pradeep Yadav) की संभावना बड़ा आकार ग्रहण कर लेगी. ऐसा लगता है कि इस खतरे का अहसास निशिकांत दूबे को भी है. तभी तो प्रदीप यादव के मैदान में उतरने पर चुनाव प्रचार नहीं करने का उनका दंभ टूट गया है. खुद तो क्षेत्र में पसीना बहा ही रहे हैं, उनकी प्रतिष्ठा बचाने के लिए पत्नी अनुकांत दूबे (Anukant Dubey) और पुत्र कनिष्ककांत दूबे (Kanishkkant Dubey) को भी रणक्षेत्र में उतरना पड़ गया है.

गुस्सा उतारने का विकल्प नहीं
गोड्डा संसदीय क्षेत्र में सबसे अधिक 04 लाख 36 हजार 747 मत आदिवासी समाज के हैं. 53 हजार 272 ईसाई आदिवासी भी हैं. दलित समाज के मतों की संख्या 01 लाख 92 हजार 362 है. मुस्लिम मतदाताओं की भी बड़ी संख्या है. 03 लाख 81 हजार 480 मत रहने के बाद भी उम्मीदवारी के मामले में 2019 की तरह इस बार भी महागठबंधन (Mahagathbandhan) ने इसकी उपेक्षा कर दी. मुस्लिम समुदाय को इसका मलाल है, पर दिक्कत यह है कि गुस्सा उतारने के लिए विकल्प नहीं है. यादव मत 03 लाख के करीब रहने की बात कही जाती है. लोग चर्चा करते हैं कि ‘लाठी के बल पर’ उम्मीदवारी हड़प ली गयी है. 02 लाख 50 हजार मत वैश्य बिरादरी के हैं. अत्यंत पिछडा वर्ग के मतदाता भी 02 लाख से अधिक हैं. कुर्मी मतों की भी‌ प्रभावकारी संख्या है.

नरेन्द्र मोदी का प्रभाव
यादव और मुस्लिम मत महागठबंधन को समर्पित हैं. आदिवासी समाज को‌ झामुमो का समर्थक माना जाता है, पर उसके एक बड़े हिस्से पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) और दूसरे पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी (Babulal Marandi) का प्रभाव है. आदिवासी महिला द्रोपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) को राष्ट्रपति बनाये जाने का अच्छा खासा असर पढ़े-लिखे आदिवासियों पर है‌. राजनीति के पंडितों का आकलन है कि इस बार आदिवासी समाज का अंदरूनी मुद्दा यही है. महागठबंधन के पास शायद इसका कोई काट नहीं है. ईसाई आदिवासी महागठबंधन के पक्षधर माने जाते हैं. सवर्ण, कुर्मी,वैश्य, दलित और अतिपिछड़ों को एनडीए समर्थक माना जाता है. इस बार उलटफेर की संभावना है.


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तब भी इत्मीनान नहीं
‘लहर मुक्त’ गोड्डा में 2019 में भी करीब-करीब ऐसे ही राजनीतिक एवं सामाजिक हालात‌ थे. भाजपा के निशिकांत दूबे के खिलाफ प्रदीप यादव ही मैदान में थे. अंतर सिर्फ इतना कि तब प्रदीप यादव (Pradeep Yadav) महागठबंधन में झारखंड विकास मोर्चा के उम्मीदवार थे, इस बार कांग्रेस के हैं. उस चुनाव में भी भाजपा विरोधी तमाम दलों की ताकत उनके साथ थी, इस बार भी है. ऐसे ही राजनीतिक व सामाजिक समीकरण में प्रदीप यादव भाजपा प्रत्याशी निशिकांत दूबे (Nishikant Dubey) से 01 लाख 84 हजार 227 मतों के बड़े अंतर से मात खा गये थे. हार उनकी इसलिए भी हो गयी थी कि एनडीए समर्थक मतों में सेंध नहीं लग पायी थी. इस बार सेंधमारी का पक्का ‘इंतजाम’ हो गया है. इसके बाद भी इत्मीनान नहीं दिख रहा है.

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