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‘सृजन’ लूट-कथा : साजिशन जोड़ दी चंदेरी की वेदना !

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‘सृजन’ महाघोटाला रूपी महापाप की सिरजनहार बहुत ही कम पढ़ी – लिखी अभावग्रस्त विधवा मनोरमा देवी थीं. मासूम चेहरा और शातिर दिमाग वाली मनोरमा देवी आखिर कौन थीं? यह जानने की जिज्ञासा हर किसी की होगी. यह भी कि कैसे इस महिला ने ‘सृजन’ की शुरुआत की? कैसे इस संस्था को बुलंदी दिलायी और फिर लूट-खसोट और अय्याशी की गिरफ्त में फंस यह कैसे अधोगति को प्राप्त हो गयी? इन तमाम सवालों का जवाब इस अंतर्कथा में है. संबद्ध आलेख की यह दूसरी कड़ी है:


शिवकुमार राय
14 अगस्त 2023

Bhagalpur : संस्था का नाम ‘सृजन’ क्यों रखा गया? इसकी एक अलग भावनात्मक कहानी है. 1989 के भागलपुर दंगा (Bhagalpur Riot) में सर्वाधिक तबाही चंदेरी में हुई थी. उसी की पीड़ा को आत्मसात कर मनोरमा देवी (Manorama Devi) ने संस्था का नाम ‘सृजन’ रखा-सृजन यानी निर्माण. ऐसा कहा जाता है कि यह नाम पत्रकार राघवेन्द्र, सहकारिता एवं स्वयं सहायता समूह के विशेषज्ञ प्रणव कुमार घोष और मनोरमा देवी के देवर सुनील कुमार (सुनील लाल) ने काफी मंथन-मनन के बाद तय किया था. ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक एवं नैतिक उत्थान के मकसद से सृजन महिला विकास सहयोग समिति (Srijan Women Development Cooperation Committee) का गठन किया गया था. शुरुआती दौर में संस्था घपलेबाजी से करीब-करीब विरत रही. इसके विस्तारित स्वरूप का आधार भी वही था. कालांतर में मनोरमा देवी के देवर सुनील कुमार की संस्था में सक्रियता बढ़ी तब गतिविधियों का रुख फर्जीवाड़े की ओर हो गया.

पटना में हो गयी देवर की हत्या
कथित रूप से सुनील कुमार ने इसे बैंकिंग से जोड़ दिया. उससे संस्था की समृद्धि अप्रत्याशित आकार लेने लग गयी, पर मूल उद्देश्य से यह भटक गयी. सुनील कुमार का प्रभुत्व बढ़ने लगा जो मनोरमा देवी और उनके अतिकरीबियों को अखरने लगा. इसी बीच 2003 में सुनील कुमार की हत्या हो गयी. पटना (Patna) के एक होटल में उन्हें मौत की नींद सुला दी गयी. आरोप होटल के एक वेटर पर लगा. कहा गया कि लूट की नीयत से उसने वारदात को अंजाम दिया. चर्चा पसरी कि वेटर की पत्नी को मुआवजे के रूप में 20 लाख रुपया देकर मुंह बंद करा दिया गया. हालांकि, पटना पुलिस के अनुसंधान में शक की सूई सृजन की ओर भी गयी. पुलिस वहां पहुंची भी. लेकिन, पैसा और पहुंच के प्रभाव में वह कुछ खास खोज नहीं पायी. ‘सृजन’ पर संदेह का कोई ठोस आधार तो नहीं था,

चर्चा यह भी हुई थी
पर कहा जाता है कि संस्था पर वर्चस्व को लेकर मनोरमा देवी और सुनील कुमार में तकरार हो गयी थी. कथित तौर पर सुनील कुमार (Sunil Kumar) ने संस्था के करोड़ों रुपये हड़प लिये थे. एक तो मनोरमा देवी के वह देवर थे, दूसरे सृजन महिला विकास सहयोग समिति के संस्थापक सदस्य भी थे इसलिए उन्हें संस्था से अलग कर देना कठिन था. एक चर्चा यह भी है कि सुनील कुमार संस्था की सचिव मनोरमा देवी को यह धमकी देते हुए पटना गये थे कि वहां वह सृजन के ‘कुकर्मों’ का राजफाश कर देंगे. इसके बाद उक्त रास्ता अपनाने के अलावा शायद और कोई विकल्प नहीं रह गया था. इन चर्चाओं में सच्चाई कितनी है यह सृजन घोटाले (Srijan Ghotala) की सीबीआई (CBI) जांच में सामने आ सकती है.

मनोरमा देवी और शाहनवाज़ हुसैन.

आवाज उठी हिस्सेदारी की
मनोरमा देवी के तीन पुत्र और तीन पुत्रियां हैं. बड़े पुत्र डा. प्रणव कुमार आस्ट्रेलिया (Australia) में हैं. क्वीसलैंड हास्पीटल में छाती एवं क्षय रोग के विशेषज्ञ हैं. पटना मेडिकल कालेज एवं अस्पताल से डाक्टरी की पढ़ाई करने के बाद रांची में प्रैक्टिस करते थे. उनकी पत्नी दिल्ली में डाक्टर हैं. डा. प्रणव कुमार (Dr. Praveen Kumar) को मनोरमा देवी के जीवित रहते ‘सृजन-साम्राज्य’ से कोई विशेष मतलब नहीं था. पर, उनके निधन के बाद वह अपना ‘हिस्सा’ खोजने लगे. मां के श्राद्ध में भागलपुर आये थे. अमित कुमार के समक्ष इस मसले को उठाया था. उसके बाद क्या हुआ नहीं कहा जा सकता. मनोरमा देवी के जीवित रहते ही इस साम्राज्य को उनके छोटे पुत्र अमित कुमार (Amit Kumar) और उनकी पत्नी रजनी प्रिया उर्फ प्रिया कुमार (Rajni Priya urf Priya Kumar) संभालने लग गये थे.


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दुर्घटना नहीं, हत्या!
सृजन से जुड़े लोगों के मुताबिक रजनी प्रिया का बढ़ रहा हस्तक्षेप फर्जीवाड़े के मास्टरमाइंड विपिन शर्मा (Vipin Sharma) को रास नहीं आ रहा था. डा. प्रणव कुमार ने हिस्सेदारी की जो आवाज उठायी थी उसके पीछे दिमाग इन्हीं के रहने की बात कही गयी थी. अमित कुमार से बड़ा भाई थे प्रणय कुमार. उन्हें पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा पर नौकरी मिल गयी थी. संभवतः 2013 में ओडीसा  (Odisha) की राजधानी भुवनेश्वर  (Bhubaneswar) में सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी. दुर्घटना में वह गंभीर रूप से घायल हुए थे. इलाज के लिए एयर एम्बुलेंस से दिल्ली (Delhi) ले जाया गया. काफी प्रयास के बावजूद बचाया नहीं जा सका. कहते हैं कि एयर एम्बुलेंस का प्रबंध तत्कालीन भाजपा (BJP) सांसद के सौजन्य से हुआ था. उनकी मौत पर सवाल उठे थे. कहा गया कि वह दुर्घटना नहीं, बल्कि हत्या थी-सुनियोजित हत्या.

विपिन शर्मा हो गये…
सृजन से जुड़े लोगों के मुताबिक मनोरमा देवी का भी मानना था कि बेटे की स्वाभाविक मौत नहीं हुई, बल्कि उनकी निर्मम हत्या (Brutal Murder) की गयी. कारण जो रहा हो, मामले को वह जोर-शोर से उठा नहीं पायीं. इससे संदेह हुआ कि साजिश में जरूर कोई न कोई उनके निकट का आदमी था. इस कारण वह विवश हो गयी थीं. भागलपुर के लोगों ने सीबीआई से इस रहस्य के खुलासे की भी उम्मीद लगा रखी है. चर्चाओं पर भरोसा करें तो द्वितीय पुत्र प्रणय कुमार की मृत्यु के बाद विपिन शर्मा मुंहबोले पुत्र के रूप में मनोरमा देवी के ‘आत्मीय’ हो गये थे. शायद इस वजह से कि वह प्रणय कुमार के जिगरी दोस्त थे.

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