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चांदन में बह गये भदरिया के अरमान

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राजेन्द्र सिंह
06 जून 2023

BHAGALPUR : अटकलों-किंवदंतियों की शक्ल में जो बातें अब तक इतिहास के किसी कोने में दुबकी और बौद्ध ग्रंथों एवं शोधकर्ताओं की शोध पुस्तकों में दुबकी पड़ी थीं, भदरिया (Bhadariya) की सरजमीन पर उसका कहीं कोई छोटा-मोटा भौगोलिक साक्ष्य भी उपलब्ध नहीं था. यह भी कि बौद्ध ग्रंथों में भगवान बुद्ध को जिस भद्दीय गांव से जुड़ा दर्शाया गया है और जिसका खुरदरा वर्तमान बन कर भी आज तक भदरिया (बांका, बिहार) अपने भाग्य पर इतरा रहा था, पेश करने के लिए बतौर साक्ष्य उसके हाथ खाली थे. यह बात दीगर है कि अपने अतीत को साकार करने के लिए उसकी कोशिशें जरूर निरंतर जारी रहीं. इसी क्रम में नवंबर 2014 में उसने जापानी बौद्ध भिक्षु द्वारा अनुष्ठानपूर्वक वहां बोधि वृक्ष लगाया और 2018 में बुद्ध पद को ससमारोह स्थापित किया.


इतिहास और बौद्ध ग्रंथों में जिस भद्दीय गांव में भगवान बुद्ध के भ्रमण का उल्लेख दर्ज है, आज का भदरिया उसी का अपभ्रंश है, जहां तब अंग महाजनपद के नगर महासेठ मेण्डक का आवास था और जिसकी सात वर्षीया पौत्री विशाखा ने पांच सौ सहेलियों और उतनी ही संख्या में दासियों के साथ गांव की सीमा पर भगवान बुद्ध का पारंपरिक तौर पर स्वागत किया था.


पुनरावृत्त होगा अतीत
बहरहाल, भदरिया अपने अतीत को जीवंत करने की लगातार कोशिशें करता रहा. इस यकीन के साथ कि आज नहीं तो कल, उसका सुनहरा अतीत जरूर पुनरावृत्त होगा. उसके इस विश्वास को पास ही बहने वाली चांदन नदी (Chanan River) ने 2020 में छठ पर्व के मौके पर तब पूर्ण कर दिया, जब ग्रामीणों द्वारा अर्घ्य के लिए घाट तैयार किया जा रहा था. तब हजारों सालों से चांदन के गर्भ में पल रहे सभ्यता के उस शिशु की किलकारियां कुछ ऐसे गूंजीं कि उसे देखने एक साथ पूरा इलाका दौड़ पड़ा. जो कुछ दिखा, उसने भदरिया के वर्तमान को झटके में ही उसके अतीत (भद्दीय) से साक्षात्कार करा दिया, यानी ईंटें से निर्मित हजारों साल पुराने भवन के अवशेष ने इतिहास की खाली झोली को भौगोलिक साक्ष्यों से भर दिया और इस प्रकार भदरिया के तमाम प्रयासों को एक मुकाम भी दे दिया.


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जीवंत करने की कोशिश
जाहिर हो, इतिहास और बौद्ध ग्रंथों में जिस भद्दीय गांव (Bhaddiya Village) में भगवान बुद्ध के भ्रमण का उल्लेख दर्ज है, आज का भदरिया उसी का अपभ्रंश है, जहां तब अंग महाजनपद के नगर महासेठ मेण्डक (Mendak) का आवास था और जिसकी सात वर्षीया पौत्री विशाखा (Vishakha) ने पांच सौ सहेलियों और उतनी ही संख्या में दासियों के साथ गांव की सीमा पर भगवान बुद्ध (Lord Buddha) का पारंपरिक तौर पर स्वागत किया था. लेकिन, काल के प्रवाह में वे तमाम बातें कथा-कहानियों और अनुपलब्ध ग्रंथों में सिमट कर रह गयीं, जिसे जीवंत करने की कोशिश भदरिया कभी बोधि वृक्ष लगाकर, कभी बोधि पद की स्थापना कर, तो जब तब वैचारिक संगोष्ठियों के माध्यम से करता रहा. चांदन (Chanan) की धार में मिले पुरावशेषों ने बतौर भौगोलिक साक्ष्य बेजुबान अभिलेखों को चीख मारने की स्थिति प्रदान कर दी. सरकार (Government) एवं पुरातत्व विभाग ने शुरुआती सक्रियता के बाद जो सुस्ती ओढ़ रखी है उससे स्थानीय तमाम अरमान चांदन में बह गये हैं.

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